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पलायन से हिंदी का बढ़ता प्रभाव

Posted On: 21 Sep, 2016 में

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झारखंड व बिहार में पलायन एक बड़ी समस्या है। खासकर इन दोनों प्रांत के लोग रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे प्रांतों में काम कर रहे हैं। भले ही वे अपने प्रांत व परिवार से हजारों किलोमीटर जाकर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं, लेकिन वे एक अच्छा काम कर रहे हैं, वह है अपनी मातृभाषा ङ्क्षहदी का प्रचार-प्रसार। पंजाब, दिल्ली, महाराष्ट्र के बाद दक्षिण के राज्यों (केरल, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, तेलगांना) में अब बिहार-झारखंड के कामगार बहुतायत संख्या में पहुंच गए हैं। छोटे-मोटे काम की तलाश में दक्षिण प्रांत के प्रमुख शहरों में पहुंचे ये कामगार ङ्क्षहदी छोड़कर दूसरी भाषा बोल व समझ नहीं सकते हैं। स्थानीय भाषा व अंग्रेजी बोलना-लिखना उनके लिए संभव नहीं है, ऐसे में अब इन मजदूरों से काम लेने वालों को भी
ङ्क्षहदी सीखने की जरुरत आन पड़ी है। केरल के कोट्टायम जिले का एक इलाका है, जहां बिहार
व झारखंड के काफी मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों का उपयोग घर के कामकाज से लेकर
ड्राइविंग व खेत के काम के लिए होता है। इस इलाके में धान की खेती साल में तीन बार होती है। इसके अलावा रबर व अनानास की भी खेती होती है। इन कामों के लिए स्थानीय मजदूर नहीं मिलते हैं। ऐसे में यहां के लोगों को बिहार के मजदूरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। कोट्टायम जिले के स्थानीय निवासी का कहना है कि उनके इलाके के ज्यादातर परिवार का
कोई एक सदस्य या पूरा परिवार भारत से बाहर काम करता है। उनके पास अपने खेत-खलिहान या घर के बुजुर्ग सदस्य की देखभाल के लिए किसी ना किसी की जरुरत पड़ती है। स्थानीय कामगार नहीं मिलते हैं। ऐसे में उन्हें बिहार या झारखंड के मजदूर पर ही निर्भर होना पड़ता है। यहां बिहार व झारखंड के मजदूरों का एक संगठन भी है। बिहार के बेतिया जिले से काम करने पहुंचे एक मजदूर मोहन कुमार का कहना है कि उन्हें एक दिन का छह सौ रुपये मिल जाता
है। वह अपने पूरे परिवार के साथ कोट््टायम में ही रह रहा है। भाषा को लेकर होने वाली दिक्कत के संबंध में उसका कहना है कि उनके मालिक भी अब ङ्क्षहदी समझने लगे हैं क्योंकि वह
ङ्क्षहदी फिल्म, सीरियल व गाना सुनता है। ऐसे में घर में मौजूद स्थानीय लोग भी हिंदी फिल्म देखने व गाना सुनने लगे हैं और उनसे हिंदी सीखने का प्रयास करते हैं। स्थानीय लोगों के साथ अब यह मजबूरी है कि उन्हें बिहार या झारखंड के मजदूरों से काम लेना है तो उन्हें हिंदी पर
ही भरोसा करना होगा। भले वे खुलकर ङ्क्षहदी नहीं बोल पाते हैं, लेकिन समझ जरूर जा रहे
हैं। ऐसे में साफ है कि जिस तरह से दक्षिण भारत के प्रांतों में बिहारी, झारखंड व उत्तर प्रदेश के कामगार मजदूर पहुंच रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब इन प्रांतों में भी ङ्क्षहदी का बोलबाला होगा। यह बदलाव उस दक्षिण भारत में हो रहा है, जो एक समय हिंदी को फूटी आंख भी देखना नहीं चाहता था। पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने से पहले तक आंध्र व तमिलनाडु के लोग हिंदी के कट्टर विरोधी थे। इसकी वजह भी थी। भारत सरकार ने 14 सितंबर 1949 को
ङ्क्षहदी को राजभाषा के रूप में अपनाया, तो वर्ष 1963 में राजभाषा अधिनियम लाया गया।
इसमें कहा गया कि 15 वर्ष के बाद पूरे देश से अंग्रेजी समाप्त कर दी जाएगी। इस पर दक्षिण भारत में काफी आंदोलन हुआ, खासकर तमिलनाडु में तो लोग आत्मदाह भी करने लगे। तब केंद्र सरकार ने वर्ष 1976 में अधिनियम में संशोधन करते हुए अंग्रेजी को ऐच्छिक भाषा बने रहने की
स्वीकृति प्रदान की। उसमें लिखा गया इंग्लिश मे कंटीन्यू। इसके बावजूद अंग्रेजी हमारे देश में हावी हो गई और राजभाषा होते हुए भी हिंदी पिछड़ गई, इसके लिए हम जिम्मेदार हैं लेकिन अब समय व रुख बदला-बदला नजर आ रहा है।

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